पुस्तक पढ़ने की कला से रूबरू कराती 'हाउ टू रीड ए बुक'
नवोदित लेखक अभिषेक केसरी अपनी पुस्तक 'हाउ टू रीड ए बुक' के माध्यम से यह बताने में पूरी तरह सफल रहे हैं कि पुस्तक आनंद के साथ पढ़ने से ज्ञान के विस्तार की दिशा में गुणात्मक वृद्धि होती है।
वैश्विक स्तर पर पुस्तकें ज्ञान के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती चली आ रही हैं। प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्चतर शिक्षा सहित अन्य विधाओं के ज्ञान अर्जन में पुस्तकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पुस्तकें ज्ञान के विस्तार की दिशा में एक मार्गदर्शक के रूप में अपनी महती भूमिका अदा करती रहती हैं। सर्वविदित है कि हम सब अपने-अपने ज्ञान को सुनकर अथवा पढ़कर विस्तार करते हैं। मैं जब कोई बात किसी से सुनता हूं, तो वह व्यक्ति भी कहीं न कहीं किसी से सुनकर अथवा पुस्तक पढ़कर ही अपनी बातों को शेयर कर पाता है। भारतीय संदर्भ में पुस्तक को ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी के रूप में दर्जा प्राप्त है। किंतु आज के बदले संदर्भ में हम सबों को यह समझने की जरूरत है कि एक पुस्तक को आनंद के साथ कैसे पढ़ा जाए ? नवोदित लेखक अभिषेक केसरी अपनी पुस्तक 'हाउ टू रीड ए बुक' के माध्यम से यह बताने में पूरी तरह सफल रहे हैं कि पुस्तक आनंद के साथ पढ़ने से ज्ञान के विस्तार की दिशा में गुणात्मक वृद्धि होती है। वे यह भी बताने में सफल रहे हैं कि पुस्तक पढ़ना भी एक कला है । उदाहरण स्वरूप जिस तरह एक सफल जीवन जीना एक कला है, ठीक उसी तरह पुस्तक पढ़ना भी एक कला है। जिस व्यक्ति को पुस्तक पढ़ने की कला आ गई, समझ लीजिए वह व्यक्ति ज्ञान के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ता ही चला जाता है ।
पुस्तक से दूरी का मतलब होता है, ज्ञान से दूर भागना
लेखक ने सवाल खड़ा किया है कि पुस्तकें तो हम सब खरीद कर अपने अपने घरों की लाईब्रेरी में सजा जरूर देते हैं, लेकिन इन पुस्तकों को कितना पढ़ पाते हैं ? उन्होंने मन में उठते इन सवालों का जवाब बहुत ही तार्किक और सहजता के साथ 'हाउ टू रीड ए बुक' पुस्तक के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाने का काम किया है । उन्होंने इस पुस्तक के माध्यम से व्यक्ति के अंदर छुपे पुस्तक पढ़ने के डर को भी दूर भगाने का काम किया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से दर्ज किया है कि पुस्तक से दूरी का मतलब होता है, ज्ञान से दूर भागना। लेखक अभिषेक केसरी की यह अंग्रेजी में लिखी पहली पुस्तक है। इस पुस्तक का प्रकाशन छत्तीसगढ़, बिलासपुर का एक प्रतिष्ठित प्रकाशन ऑथर्स क्लिक पब्लिशिंग ने किया है। इस पुस्तक में कुल 137 पृष्ठ हैं।
पुस्तक ज्ञान की कुंजी
लेखक ने 'हाउ टू रीड ए बुक' की विषय सूची में तेरह उपशीर्षक के माध्यम से अपनी बातों को बहुत तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने पुस्तक का नाम कुछ ऐसा रखा है कि एक बार में ही पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहा है। उन्होंने विषय सूची में प्रथम उपशीर्षक रुप में पुस्तकें क्या हैं ? को दर्ज किया है। पुस्तक पढ़ने से पहले हर पाठक को यह जानना जरूरी हो जाता है कि पुस्तक क्या है ? जब तक हम यह जानेंगे नहीं कि पुस्तक क्या है ? इसके महत्व को समझ नहीं पाएंगे । पुस्तक ज्ञान की कुंजी है। दुनिया में जितने भी विद्वान हुए, उन सबों की विद्वता को निखारने में पुस्तकों का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पुस्तक से मैत्री कर ही वास्तविक रूप से अपने ज्ञान को विस्तार दे सकते हैं। पुस्तक सिर्फ चंद कागज के पन्नों में मुद्रित शब्द ही नहीं है बल्कि ज्ञान का एक अनुपम भंडार हैं। हम मुद्रित शब्दों को जितने मन से ग्रहण करेंगे, वे हमारे ज्ञान को एक नई दिशा प्रदान करेंगे।
स्वयं को विकसित करना चाहते हैं, तो पुस्तक पढ़ना जरूरी है
लेखक ने दूसरे उपशीर्षक पुस्तक-पठन की जरूरत क्यों है ? के माध्यम से एक बड़ी बात कहने की कोशिश की है कि जिस तरह शरीर के विकास के लिए भोजन जरुरी है, उतना ही बौद्धिक व मानसिक विकास के लिए पढ़ना जरूरी है। अगर हम सच्चे अर्थों में भौतिक स्तर पर अपने आप को विकसित करना चाहते हैं, तो पुस्तक पढ़ना जरूरी है। यह सिर्फ चाह नहीं बल्कि बौद्धिक जरूरत हो। तीसरा उपशीर्षक है, सूक्ष्म आदतें, एटॉमिक हैबिट्स्। पुस्तक पढ़ने से पूर्व स्वयं को मानसिक रूप से ऐसा बनाएं कि जिस विषय को पढ़ने जा रहे हैं, एक महोत्सव मनाने जैसा पढ़ें । वहीं पढ़ते समय कभी भी पृष्ठ की गिनती नहीं करें ,बल्कि आनंद के साथ आगे बढ़ते जाएं । कभी-कभी पढ़ते पढ़ते मन बोर सा हो जाता है, इस बोरियत से घबराएं नहीं, बल्कि उस बोरियत को आनंद के साथ गले लगाएं। चौथा उपशीर्षक, बिंदुओं को जोड़ना, है। पुस्तक पढ़ते समय मन में कई सवाल उठेंगे, जो स्वाभाविक है। लेकिन उठते इन सवालों पर समग्रता के साथ तभी विचार किया जा सकता है,जब पूरी पुस्तक पढ़ी जाए । तब हर एक बिंदु को जोड़कर समझना आसान होगा।
पढ़ने के समय मन मस्तिष्क में प्रसन्नता रहनी चाहिए
पांचवा उपशीर्षक है, क्या और क्यों से शुरुआत करें । पुस्तक पढ़ने से पूर्व विषय क्या है ? और इसकी शुरुआत क्यों कर रहे हैं? इसे जानना जरूरी हो जाता है। जब तक हम विषय पर पूरी तरह मानसिक रूप से तैयार नहीं होंगे, यह सिर्फ कागज पर मुद्रित शब्द पढ़ने जैसा होगा। ऐसा पढ़ना न पढ़ने के समान होगा। इसलिए पढ़ने से पूर्व खुद को मानसिक रूप से तैयार करें। जिस तरह हम बहुत ही प्रसन्न मन से किसी उत्सव में शामिल होते हैं, ठीक उसी तरह पढ़ने के समय भी वही प्रसन्नता मन मस्तिष्क में भी रहनी चाहिए। छठा उपशीर्षक है, जटिल अवधारणाओं को सीखना । अर्थात पढ़ते समय कई जटिल शब्द और परिभाषा आएंगे । उससे घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि इन जटिल अवधारणाओं से नया सीखने की जरूरत है। सातवां उपशीर्षक है, हम अनुमान लगाना पसंद नहीं करते, फिर भी अनुमान लगाते रहते हैं । लेखक ने स्पष्ट किया है कि बहुत से शब्दों के मायने अलग अलग जगहों में बिल्कुल भिन्न होते हैं। इसलिए पूरे संदर्भ को समझने की जरूरत है। आठवां उपशीर्षक है, पंक्तियों के बीच का अर्थ पढ़ें । उदाहरण स्वरूप एनसीईआरटी जो किताबें तैयार करती हैं, उससे पूर्व टेक्स्ट बुक डेवलपमेंट कमेटी के सदस्यों को सुपुर्द करती हैं। किताब तैयार करने के लिए टेक्स्ट बुक के सदस्य गण उस विषय को बहुत ही बारीकी से छात्रों को ध्यान में रखकर तैयार करते हैं। इसलिए पाठकों को पढ़ते समय पंक्तियों के बीच के वाक्य को गहराई से समझने की जरूरत है।
पुस्तकों के साथ हमारा संबंध दोस्ताना होना चाहिए
नौवां उपशीर्षक है,भाषा और विषय के बीच संबंध । किसी भी पुस्तक को पढ़ने से पूर्व यह पुस्तक किस भाषा में दर्ज है ? यह जानना जरूरी है। जिस विषय अथवा भाषा की पुस्तक पढ़ने जा रहे हैं, छात्रों व पाठकों को उस भाषा की अच्छी जानकारी होनी चाहिए । अगर भाषा की अच्छी जानकारी नहीं होगी, तब लेखक जिस बात को कहना चाह रहा है, उस भाव को समझ नहीं पाएंगे । आप किताब ऐसे पढ़ें,जैसे लगे कि लेखक के मनोभाव से बातचीत हो रही है। दसवां उपशीर्षक है, किसी पुस्तक को कम-से-कम एक से अधिक बार पढ़ें। आप स्वयं को कितनी बार खोज सकते हैं ? किताब पढ़ने से पूर्व पाठक को यह समझना चाहिए कि लेखक जिस संदर्भ में अपनी बात कहना चाह रहा है , वहां तक पहुंच रहे हैं अथवा नहीं ? जब आप वहां तक पहुंच पाते हैं, इसका मतलब है, आपका लेखक के मनोभाव से साक्षात्कार होना। सच्चे अर्थों में यही सर्वश्रेष्ठ पाठन होगा। ग्यारहवां उपशीर्षक है, एक कहानीकार बनें । लेखक यह बताना चाहते हैं कि अगर आप कोई पुस्तक पढ़ते हैं, और उसे आप आसान शब्दों में बोलने अथवा लिखने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। इसका मतलब है कि आपने किताब को समझा ही नहीं है। सिर्फ पढ़ा है। इसलिए जरूरी है, किताब को समझना। बारहवां उपशीर्षक है, पुस्तकों के साथ हमारा संबंध । पाठकों को यह जानने और समझने की जरूरत है कि पुस्तकें सदा जीवंत रहती हैं। पुस्तकें कभी मरती नहीं है। पुस्तकें जिस कालखंड में भी लिखी गई हैं, पढ़ने मात्र से सभी दृश्य स्वस्फूर्त जीवंत हो जाते हैं। ऐसा समझकर पुस्तक पढ़ने से पढ़ने का आनंद कई गुणा बढ़ जाता है ।इसलिए पुस्तकों के साथ हमारा संबंध दोस्ताना होना चाहिए। तेरहवां उपशीर्षक है,क्या पुस्तक-पठन एक मनोवैज्ञानिक उपचार है ? पुस्तक पढ़ना एक मनोवैज्ञानिक थेरेपी है। उदाहरण स्वरूप यह बात सामने आई है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जिन-जिन सैनिकों ने पुस्तकें पढ़ीं अन्य सैनिकों की तुलना मानसिक रूप से ज्यादा स्वस्थ रहे थे।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0











