बांका में नागरिक को असामाजिक तत्व घोषित करना पड़ा महंगा, पटना हाईकोर्ट ने रद्द किया आदेश; अधिकारियों से वसूले जाएंगे 1.10 लाख रुपये
पटना: पटना हाईकोर्ट ने बांका जिले में एक नागरिक को बिना ठोस आधार के असामाजिक तत्व घोषित करने और उसे घर से 40 किलोमीटर दूर थाने में बैठने का आदेश देने की कार्रवाई को रद्द कर दिया है। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना है। अदालत ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता गिरधारी यादव को एक लाख रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने का निर्देश दिया है।
पटना:- पटना हाईकोर्ट ने बांका जिले में एक नागरिक को बिना ठोस आधार के असामाजिक तत्व घोषित करने और उसे घर से 40 किलोमीटर दूर थाने में बैठने का आदेश देने की कार्रवाई को रद्द कर दिया है। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना है। अदालत ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता गिरधारी यादव को एक लाख रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने का निर्देश दिया है।
मामला बांका जिले के कटोरिया निवासी गिरधारी यादव से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, चुनाव से पहले स्थानीय पुलिस ने बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2024 के तहत उन्हें असामाजिक तत्व घोषित करने की अनुशंसा की थी। पुलिस का आरोप था कि दो मामलों में जमानत पर बाहर चल रहे गिरधारी यादव संदिग्ध लोगों से मिल रहे हैं और सार्वजनिक शांति भंग कर सकते हैं।
स्थानीय पुलिस निरीक्षक की ओर से दर्ज अस्पष्ट सनहा (थाना डायरी प्रविष्टि) के आधार पर बांका के तत्कालीन जिलाधिकारी ने 8 सितंबर 2025 को आदेश जारी किया था। इसके तहत गिरधारी यादव को अपने घर से करीब 40 किलोमीटर दूर बाराहाट थाने में चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक उपस्थित रहकर बैठने का निर्देश दिया गया था।
इस आदेश को गिरधारी यादव ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई के बाद खंडपीठ ने जिलाधिकारी के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पुलिस की सनहा प्रविष्टि या संदेह के आधार पर किसी नागरिक को असामाजिक तत्व घोषित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप करने वाला प्रशासनिक आदेश पुलिस अधिकारियों की मनमानी और निरंकुशता के आधार पर जारी नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना।
हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई के कारण याचिकाकर्ता को हुई परेशानी और रोजगार पर पड़े प्रभाव को भी ध्यान में रखा। अदालत ने राज्य सरकार को एक महीने के भीतर गिरधारी यादव को कुल 1.10 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। इसमें एक लाख रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये कानूनी खर्च शामिल हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजे और मुकदमे के खर्च की राशि जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल की जाए। इसके लिए राज्य सरकार को अगले छह महीने के भीतर दोषी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से वसूली की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया है।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल करते समय नागरिकों के मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करना अनिवार्य है।
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