एकात्म मानववाद के शिल्पकार : पंडित दीनदयाल उपाध्याय

( 11 फरवरी, महान राष्ट्रवादी नेता  पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 58 वीं पुण्यतिथि पर विशेष  )

Feb 10, 2026 - 17:50
एकात्म मानववाद के शिल्पकार : पंडित दीनदयाल उपाध्याय

महान राष्ट्रवादी, एकात्म मानववाद के शिल्पकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय का संपूर्ण जीवन भारत को  सुसंस्कृत, सुसंगठित और मजबूत करने में बीता था।  वे एकात्म मानववाद के प्रबल पक्षधर थे। उनकी दृष्टि विशुद्ध भारतीय है।  उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को राष्ट्र के अनुकुल कहा था।   उन्होंने एकात्म मानववाद की विचारधारा प्रस्तुत कर कहा था कि 'आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख है'।  आज की बदली परिस्थिति में राजनीति जिस दिशा में दौड़ रही है, जहां परिवारवाद, भाई भतीजावाद, जातिवाद और धर्मवाद की होड़ लगी हुई है। इस होड़ में भारत की एकता अखंडता और राष्ट्रवाद गुम होती चली जा रही है । यह बेहद चिंता की बात है । भारत की अखंडता को तोड़ने के लिए विश्व कई देश लगे हुए हैं। भारत का बिलकुल पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान किस तरह पाक प्रायोजित आतंकवादी भारत की एकता और अखंडता  को एक साजिश के तहत तोड़ने में लगे हुए हैं, फलस्वरुप भारत सरकार को ऑपरेशन सिंदूर जैसी कार्रवाई करने के लिए विवश होना पड़ा था । कनाडा की सरकार किस तरह भारत की अखंडता को तोड़ने वाली शक्तियों को अपने यहां पनाना दे रही है।  कनाडा सरकार की इस  साज़िश अपरोक्ष रूप से चीन और पाकिस्तान जैसे देश भी शामिल है। देश की एकता और अखंडता के मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष को एक होना बहुत जरूरी है । तभी देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रह सकती है। 
   दीनदयाल उपाध्याय का मत है कि 'राजनीति का सही उद्देश मानव का कल्याण होना चाहिए। इस कल्याण में राष्ट्र  सुसंस्कृत, सुसंगठित और मजबूत कैसे हो'। यह विचारधारा ही सच्चे अर्थों में एकात्म मानववाद है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि 'भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन है।  उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है । इस संस्कृति में निष्ठा रहे, तभी भारत एकात्म रहेगा।'   पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इस विचार पर समस्त देशवासियों को गहन चिंतन करने की जरूरत है। साथ ही इस विचारधारा को आत्मसात करने की जरूरत है । आज देश पर बाहरी साजिशें इस कदर हावी होती चली जा रही हैं, जो भारत को खंड खंड करने में तुली हुई हैं। कुछ साजिशें  ऐसी रची गई हैं कि भारत को कैसे उसकी मूल संस्कृति से अलग कर दिया जाए। ये साजिशें देशवासियों के बीच फुट  डालकर  वैमनस्यता पैदा करना चाहती हैं।  इन तमाम साजिशों से मुकाबला करने के लिए भारत को एक बार फिर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के विचार को समझने और आत्मसात करने की जरूरत है। 
  पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के विचारधारा का मतलब है, भारत एक मजबूत राष्ट्र बने । इस राष्ट्र में रहने वाले हर व्यक्ति राष्ट्रवादी बनें।  राष्ट्रप्रेम यहां के निवासियों में जागृत रहें।  राष्ट्र निष्ठा की  समूह  सच्चे अर्थों में एकात्म मानववाद है।  पंडित दीनदयाल उपाध्याय 'वासुदेव कुटुंबकम' की विचारधारा भारतीय सभ्यता की देन है।  इसी विचारधारा के अनुसार भारत में सभी धर्मों को समान अधिकार प्राप्त है।  संस्कृति से किसी व्यक्ति, वर्ग, राष्ट्र आदि की बातें जो उसके मन, रुचि, आचार, विचार, कला, कौशल और सभ्यता की सूची होती है, पर विचार होता है।  दूसरे शब्दों में कहें तो यह जीवन की शैली है। देश के कई तथाकथित विद्वान गण भारत की संस्कृति, रीति रिवाज, भाषा, रहन-सहन को ही धर्म कहने में संकोच नहीं करते हैं, बल्कि ये धर्म नहीं हैं।  वस्तुत: ये भारत की मूल संस्कृति है, जो भारत की जीवन शैली है।  यहां विभिन्न धर्म, पंथ और विचार के लोग एक साथ जरूर रहते हैं।  इसके बावजूद सबों की जीवन शैली एक है।  सबो की राष्ट्रीयता एक है।  सबो का राष्ट्रप्रेम एक है।  पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार अगर राष्ट्र मजबूत होता है, तभी देश की जनता मजबूत होती है।  अगर  देश की जनता कमजोर होती है, तब राष्ट्र भी कमजोर होता है। एक राष्ट्र की मजबूती के लिए देश की जनता का मजबूत होना बहुत जरूरी है।
   पंडित दीनदयाल उपाध्याय  का दृष्टिकोण मजबूत जनता और मजबूत राष्ट्र है।  आज देश में जो हालात पैदा किए जा रहे हैं ,भारत को तोड़ने की कोशिश की जा रही है।  यह यह एक विश्वव्यापी सोची समझी साजिश है । पंडित दीनदयाल उपाध्याय  ने भारतीय जीवन दर्शन का बहुत ही गहराई के साथ अध्ययन किया था। भारत को विश्व मानचित्र पर कैसे एक मजबूत राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित करें ? इस दिशा में उन्होंने जो एकात्म मानववाद का विचारधारा प्रस्तुत किया था, उसके पीछे बस ! एक मात्र उद्देश्य यह था कि देशवासी  सच्चे राष्ट्रभक्त बने।  
   पंडित दीनदयाल उपाध्याय का बचपन बहुत ही परेशानियों में बीता था। उनकी परेशानियों का मतलब है, उन्हें बचपन से ही अपने परिवार वालों को खोना पड़ा था। ‌ तीन साल की उम्र में उनके पिता का जाना।  साथ साल की उम्र में माता का जाना । फिर  नानी का गुजर जाना।  इसके बाद अनुज भ्राता का गुजर जाना।  अर्थात उन्नीस वर्ष की उम्र तक उनका परिवार के अनन्य सदस्यों से बिछड़ना हुआ था। यह बिछड़ना   उन्हें परेशान जरूर किया था,  लेकिन मन से वे उतने ही मजबूत थे। चूंकि  उन्हें भावी भारत के एकात्म मानववाद की विचारधारा प्रस्तुत करना था।   परिवारिक बिछड़न की पीड़ा इनके मन में जरूरत थी, इसके बावजूद वे एक नए भारत के निर्माण के सिद्धांत को प्रस्तुत करने में जुट गए थे।  पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद नाना के कहने पर उन्होंने  प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी थी । वे इस परीक्षा में उत्तीर्ण भी हुए थे।  लेकिन उन्हें अंग्रेजी सरकार में नौकरी करना उचित नहीं लगा था। उन्होंने नौकरी ना करने की बात अपने नाना से स्पष्ट रूप से कह दिया था।  नाना के लाख समझाने के बावजूद पंडित दीनदयाल उपाध्याय नहीं माने थे।  इसके अलावा भी वे  कई और परीक्षाओं में भी उत्तीर्ण हुए थे।  लेकिन उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत में नौकरी नहीं की थी। 
  वे 1937 में राष्ट्रीय सेवक सेवक संघ से जुड़ गए थे।  संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार का सानिध्य कानपुर में उन्हें मिला था।  उन्होंने कानपुर में राष्ट्रीय सेवक संघ का प्रशिक्षण पूरा किया था।  इस प्रशिक्षण के उपरांत वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवन वृति प्रचारक बन  गए थे।  वे आजीवन संघ के प्रचारक रहे थे।  संघ के माध्यम से ही उपाध्याय जी को भारतीय राजनीति में लाया गया था । 21 अक्टूबर 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में भारतीय जनसंघ पार्टी की स्थापना हुई थी । इस स्थापना में गुरुजी ( गोलवलकर जी ) की प्रेरणा निहित थी । 1952 में जनसंघ का  प्रथम अधिवेशन कानपुर में हुआ था।  उपाध्याय जी इस दल के महामंत्री बने थे।  इस अधिवेशन में पारित 15 प्रस्तावों में से सात उपाध्याय जी ने ही प्रस्तुत किया था।  डॉक्टर श्याम प्रसाद मुखर्जी ने उनकी कार्यकुशलता और क्षमता से प्रभावित होकर कहा कि 'यदि मुझे दीनदयाल उपाध्याय मिल जाए तो मैं भारतीय राजनीति का नक्शा ही बदल दूं'।  श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जिस आत्मविश्वास के साथ पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संबंध में यह बात कही थी,  निश्चित तौर पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय का व्यक्तित्व और कृतित्व ऐसा ही था।
 वे  1967 तक भारतीय जनसंघ के महामंत्री रहे थे।  1967 में कालीकट अधिवेशन में उपाध्याय जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। वे मात्र चालीस दिनों तक ही जनसंघ के अध्यक्ष रहे  थे। 11 फरवरी 1968 की रात्रि में मुगलसराय स्टेशन पर उनकी हत्या कर दी गई थी।  दूसरे दिन सुबह स्टेशन के पास ही उनकी लाश पड़ी हुई थी।  लोग देखकर हतप्रभ हो गए थे । भारत को एकात्म मानववाद का सूत्र देने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस दुनिया में नहीं रहे।  यह खबर आग की चिंगारी की तरह संपूर्ण देश में फैल गई थी। पुलिसिया अनुसंधान जरूर हुआ था, लेकिन हत्यारे पकड़े नहीं गए।  उनकी हत्या एक विश्वव्यापी साजिश का हिस्सा था।‌ अगर मैं ऐसा लिखता हूं तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।  पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद का जो  विचार दिया, उस पर चलने  की जरूरत है । सच्चे अर्थों में उनके प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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