महागौरी की भक्ति से चित सादगी और पवित्रता की ओर अग्रसर रहती है
(30 सितंबर, शारदीय नवरात्र के आठवें दिन माता महागौरी की आराधना पर विशेष)
महागौरी माता की आराधना से चित्र सादगी और पवित्रता की ओर सदा अग्रसर बनी रहती है। इनके पूजन से मनुष्य का जीवन सरल और सहज बन जाता है। महागौरी माता सादगी, पवित्रता, सहजता और सरलता की प्रतिमूर्ति देवी के रूप में भी जानी जाती है। आज की बदली सामाजिक परिस्थिति, भौतिकतावादी और आधुनिक जीवन शैली में लोग बहुत तेजी के साथ आधुनिकता की भागते चले जा रहे हैं । फलस्वरुप मनुष्य के जीवन में सब कुछ रहकर भी असंतोष बढ़ता ही चला जाता है । इसलिए इन विपरीत परिस्थितियों में महागौरी माता की आराधना से सहज और सरल जीवन की भी सीख लेनी चाहिए।
शारदीय नवरात्र के आठवें दिन माता महागौरी की विशेष रूप से पूजा,अर्चना और आराधना की जाती है। महागौरी की पूजा अर्चना और आराधना से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं । माता महागौरी दुर्गति नाशिनी है । माता महागौरी कालनाशिनी है । महागौरी माता की आराधना से भक्तों को इसी संसार में सब प्रकार के सुख, समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है तथा मृत्यु के बाद पुनः माता की सेवा में उत्पन्न होते हैं। समस्त प्राणियों की सुख दात्री महागौरी माता की कृपा से उनके भक्तगण सदा आनंद में रहते हैं। माता के भक्त दूसरे को भी आनंद प्रदान करते हैं। यह उत्सव हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में हम सबों के बीच उपस्थित होता है। भक्तों के सभी प्रकार के कष्ट हर कर माता विदा होती हैं। संसार में जितने भी प्रकार के सुख, शांति, समृद्धि और वैभव विद्यमान हैं। यह सब कुछ माता की ही कृपा है।
शारदीय नवरात्र के आठवें दिन माता के भक्तों को निर्जला उपवास रखना चाहिए । महाअष्टमी के दिन सुहागन महिलाएं सदा सुहागन बने रहने के लिए माता के श्री चरणों में चुनरी अर्पित करती है । ऐसी सुहागन महिलाएं महागौरी माता के श्री चरणों में चुनरी अर्पित कर सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद प्राप्त करती है । महागौरी माता का स्वरूप पूर्ण गोर है। माता के इस गोरेपन की तुलना सिर्फ माता महागौरी से ही की जा सकती है । माता सफेद रंग का वस्त्र और सफेद रंग के पुष्प से बने आभूषण धारण की हुई है। उनका चित बिल्कुल शांत और सौम्य है। इनकी प्रतिमा के दर्शन मात्र से भक्तों को एक अजीत शांति की प्राप्ति होती है। माता महागौरी एक हाथ से भक्तों को आशीर्वाद दे रही होती है तथा दूसरे हाथ से वरदान भी दे रही होती है। श्री देवी पुराण में ऐसा वर्णन है कि महागौरी माता की भक्ति से यश, बल, धर्म ,आयु की वृद्धि होती है। मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। शारदीय नवरात्र पर्व का हमारे धर्म ग्रंथों में बहुत ही ऊंचा स्थान प्रदान किया गया है।
नवरात्र पर्व का हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों में बहुत ही महत्व है। आज दुनिया में जिस तरह की भी शक्तियां विद्यमान है। सभी दुर्गा माता की ही तेज से उत्पन्न हुई । मां की कृपा के बिना कोई भी शक्ति गतिशील नहीं हो सकती है। माता के हर रूपों का एक गौरवशाली इतिहास है, जो हमारी धार्मिक भावनाओं और श्रद्धा को प्रतिष्ठित कर संदेश देती हैं। दुर्गा सप्तशती में यह बात दर्ज है कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है। किंतु माता कभी भी कुमाता नहीं हो सकती है। इस छोटे से वाक्य में हिंदू दर्शन की बहुत बड़ी बात छुपी हुई है। इसलिए हमारी रीति - रिवाज और धर्म संस्कृति में प्रारंभ से ही माता का ख्याल रखने के लिए कहा गया है। यह पर्व हमें दूसरों की मदद करने, दूसरों की भलाई करने और विश्व बंधुत्व की सीख भी प्रदान करता है।
पाप और पुण्य दोनों मां के ही पुत्र हैं। दोनों को मां समान रूप से जन्म देती हैं। लेकिन एक अपने प्रारब्ध कर्म के कारण पाप में परिवर्तित होता और दूसरा पुण्य में। जब सृष्टि में पाप बढ़ जाते हैं। तब पुण्य जनों के उद्धार के लिए माता प्रकट होती है। नवरात्र का पर्व सत्य और असत्य पर आधारित है। असत्य कितना भी विशाल क्यों ना हो जाए ? वह कालजयी नहीं हो सकता है। उसे एक न एक दिन सत्य के हाथों पराजित होना ही होता है। नवरात्र का पर्व हम सबों को सत्य के साथ खड़े होने की सिख प्रदान करता है। यह पर्व असत्य पर सत्य की विजय के रूप में भी मनाया जाता है।
देवी पुराण में वर्णन है कि जब पृथ्वी पर आसुरी शक्तियां बहुत ही प्रबल हो गई थीं। आसुरी शक्तियों के अत्याचार से देवगण भयाक्रांत हो गए थे। आसुरी शक्तियों के वर्चस्व इतने बढ़ गए थे कि देवगण के सिंहासन भी आसुरी शक्तियों के अधीन हो गए थे। आसुरी शक्तियों से बचने के लिए सभी देवताओं ने मिलकर माता दुर्गा की आराधना की थीं। एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा जी के तेज से आदि शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा अवतरित हुई थीं। आसुरी शक्तियों के प्रतीक महिषासुर अपने अहंकार में इतना चूर हो गया था कि वह जिनसे शक्तियां प्राप्त किया था , उसी को ही चुनौती देने लगा था । महिषासुर की आसुरी शक्तियों के अत्याचार से चंहुओर त्राहिमाम त्राहिमाम होने लगा था। माता के अवतरण के साथ ही सबसे पहले माता अपने भक्तों की भक्ति स्वीकार की थीं। तत्पश्चात देवगणों को महिषासुर के अत्याचार से मुक्त करने के लिए सीधे रण भूमि में कूद पड़ी देवी थी। देवी पुराण में जिस तरह रणभूमि की विभीषिका का वर्णन किया गया है। महिषासुर और माता दुर्गा के युद्ध के समान ना कभी भूतकाल में ऐसा हुआ था और ना भविष्य में होगा। इस युद्ध में संपूर्ण ब्रह्मांड हिल गया था । आकाश से बादल टूटकर गिरने लगे थे। हवा की तरह पर्वत इधर से उधर बह रहे थे ।आकाश से सिर्फ और सिर्फ आग ही बरीस हो रही थी। युद्ध सत्य और असत्य के बीच चल रही थी। आसुरी शक्ति महिषासुर ने विभिन्न रूपों में भेष बदलकर माता को पराजित करने का संपूर्ण कोशिश किया था। लेकिन उस अहंकारी महिषासुर को यह पता ही नहीं था कि उसके पास जो भी शक्तियां विराजमान थीं। सभी मां की कृपा से ही प्राप्त हुई थी। महिषासुर की शक्तियां, मां की तेज का एक अंश भी नहीं था। उसे इस अंश पर इतना गुमान था। मां उन्हें अपनी पूर्ण शक्ति को प्रदर्शित करने का अवसर दे रही थीं। माता ने उसे अपनी गलती स्वीकार करने का भी अवसर पर अवसर प्रदान करती चली जा रही थीं। इसके बावजूद महिषासुर को अपने अहंकार का भान ही नहीं हो रहा था। अंततः मां अपने विराट रूप में उपस्थित हुई और पलक झपकते ही उसका सर्वनाश कर दी थीं।
माता महागौरी बहुत ही कल्याणकारी देवी के रूप में पूजी जाती हैं। शारदीय नवरात्र पर इनकी आराधना संपूर्ण देश में बहुत ही भक्ति पूर्ण ढंग से होती है। महाअष्टमी के दिन माता के दरबार में महाभोग का आयोजन होता है । शारदीय नवरात्र के अष्टमी के दिन देश में स्थापित लगभग सभी पंडालों में महा भोग का आयोजन होता है। भक्तों के बीच तरह-तरह के पकवान बांटे जाते हैं । माता का प्रसाद श्रद्धा पूर्वक खाने वाले भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं । मां के प्रसाद में इतनी ताकत होती है कि उसका मन पाप कर्म में से दूर भागता है , तथा सत्कर्म करने की ओर खुद ब खुद पैर आगे बढ़ जाते हैं। इसलिए महाअष्टमी के दिन भक्तों को मन और चित शांत कर पूरे ध्यान से माता महागौरी की आराधना करनी चाहिए । शारदीय नवरात्र पूजा के नौ दिनों की पूजा का बड़ा महत्व है, लेकिन महाष्टमी की पूजा का विशेष महत्व है । इसलिए भक्तों को महाष्टमी के दिन बहुत ही ध्यान के साथ माता महागौरी की पूजा और वंदना करनी चाहिए ।
